Brajesh Singh

Poetry

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My Poetry

रहगुज़र

 

किसी आशियाँ की तलाश में जो चले थे मेरे साथ वो

ना क़दम रहे, ना वो कारवाँ, सब रहगुज़र भी चले गये

कुछ लोग जो थे हमसफ़र, उन्हें मिल गया कोई और सा…

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परिन्दे

 

वो परिन्दे भी अब यहाँ नहीं आते
वो कहीं दूर बस गये शायद

फल लदे पेड़ सूखने से लगे
ज़मीं के कन्धे धँस गये शायद
 
शह…

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कितने बसंत काटोगे एेसे?

 

कितने बसंत काटोगे एेसे? कितने सावन गाओगे?

जब भी साँझ ढलेगी, तुम फिर अपने घर को आओगे

 

 

फिर ढूँढोगे अम्माँ ! नानी ! भूल गये थे जिनको अब तक…

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बारिश

 

आज बारिश में नहाया जी भर
'मैं' को खोया, तभी ख़ुद को पाया जी भर
 
गुज़ारा वक़्त ख़ुद के साथ एक अरसे के बाद
यादों के परिंदों को बुलाय…

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मैं फिर वो ज़िंदगानी चाहता हूँ...

 

मैं फिर वो ज़िंदगानी चाहता हूँ,
लड़कपन की कहानी चाहता हूँ, 
अकेलेपन की इन पगडंडियों पर,
घनी बारिश का पानी चाहता हूँ !!

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उड़ता- फिरता सा रहता है..!

उड़ता- फिरता सा रहता है
मन भँवरे सा क्यों रहता है?

कल तक वो जो हमसाया था
बेगाना सा क्यों रहता है?
 
बरसों बीते बिछड़े फि…

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इक दिन का गुलज़ार बना दो...

इक दिन का गुलज़ार बना दो

 

मुझमें भी शायद कुछ पकता सा रहता है,
कुछ तो है जो मुझमें भी जलता रहता है,
मेरे अंदर की कुछ नदियाँ जमी पड़ी हैं,…

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सुख में तो सब साथ खड़े थे...

सुख में तो सब साथ खड़े थे,
दुःख में तुमने साथ दिया है

मैं था कितना एकाकी, कितना ठहरा सा, जब तुम आये थे जीवन में
मीठी सी ज्यों धूप…

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