Brajesh Singh

Poetry

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हृदय परिवर्तन

सर..! एअरपोर्ट जाने के लिये थोड़ा जल्दी निकलिए, आज ट्राफिक कुछ ज़्यादा ही है. देखा कि उम्र के लगभग पचास पड़ाव पार कर चुका एक शख़्स मेरा सामान लिए खड़ा था.
सर .. लगता है दिवाली पर घर जा रहे हैं? कहाँ के रहने वाले हैं आप?
उसकी गर्मजोशी देखकर मैं चुप नहीं रह पाया..

जी..! मैं घर जा रहा हूँ, पर अभी लख़नऊ...आपका नाम ? बात बढ़ाने के लिए मैने पूँछा, कहाँ के रहने वाले हो ?

सर, ख़लील नाम है... मुज़्ज़फ़रनगर के पास मेरा गाँव है. यही कोई दो-ढाई साल से टैक्सी चला रहा हूँ, मेरा लड़का यहाँ इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है. वहाँ थोड़ी सी प्रॉब्लम थी, बच्चे के लिए इधर दिल्ली आ गये... सब छोड़ कर. कहते-कहते उसका गला भर सा गया.

खिड़की का काँच उतारकर मैंने भी मुद्दा बदलने की कोशिश की. मन का जहाज़ मुझे मेरे बचपन तरफ़ उड़ा ले गया.

उस समय दिवाली की अगली सुबह-सुबह शरीफ़, लियाक़त और अश्फ़ाक अपनी ढोलक-ढपली लेकर आ धमकते थे, लक्ष्मी पूजन वाली मिठाई और रात का बचा हुआ खाना उनकी सबसे बड़ी उम्मीद थी और उन्हें उसमें कोई ऐतराज़ भी ना था. झब्बे धोभी, बनवारी नाई, चरने चमार, वहीदन...सब एक साथ घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठ जाते थे और मेरी दादी पत्तल बिछवाकर उनमें पूरी-कचौरी, सब्ज़ी- भाजी परोसवाया दिया करती थीं, एक साथ हँस खा कर, दुआएँ देते चले जाते थे, कभी भी महसूस नहीं हुआ कि खान-पान भी बँटवारा करवा सकता है.

पहले दिवाली पूजन वाले बताशे, ख़ील- गट्टे तो हमारे क़स्बे में मुसलमान ही बेचा करते थे और मुझे अपनी दुकानों पर देखकर जितने प्यार से हिंदू व्यापारी मिलते थे उतनी ही मुहब्बत से मुसलमान भी... बड़ी साफ़ बात तो ये थी कि मेरी पहचान मेरी जाति-धर्म से नहीं, मेरे पिता जी के सम्मान और मेरे व्यवहार से थी. क़स्बे के बाज़ार में ख़लील चचा की जूते-चप्पल बेचने की सबसे बड़ी दुकान थी, इलाक़े का शायद ही कोई शख़्स हो जिसका उनसे वास्ता ना पड़ा हो. मुझे यूँ तो ज़्यादातर स्कूल वाले जूते ही पहनने होते थे लेकिन कभी कभार चचा शहर अक्सर नयी डिज़ाइन वाले जोड़े ख़ास मेरे लिए लेकर आते थे और उन जूतों को पहनकर मेरे ठाट ही कुछ और होते थे.

मेरी उम्र लगभग बारह-तेरह साल की रही होगी जब राम मंदिर आंदोलन की लपट हमारे गाँव तक भी पहुँच गयी थीं, राम के नाम पर ईंटें और पैसे इकट्ठे किया जा रहे थे और अचानक ख़बर आई की कार सेवकों पर गोलियाँ चलाईं गयीं हैं... ख़बर आग बन गयी, कुछ लोगों के साथ मैं भी भीड़ का हिस्सा बन गया, अंदर का जानवर कुलबुलाने लगा, ऐसा सिखाया गया कि फ़ैज़ाबाद का बदला मुझे ही लेना होगा. पता नहीं कब कैसे किसने मुसलमानों की दुकानों में आग लगाने की आवाज़ लगाई...भीड़ से कुछ लोगों ने दुकानों के ताले -शटर तोड़ने की बेनतीजा कोशिश की, फिर आग लगाने पर बन आयी और मैं जैसे ही आगे बढ़ा देखे कोने में ख़लील चचा खड़े थे, निश्तेज चेहरे पर आँसू बह रहे थे, हाथ और होंठ काँप रहे थे... ख़लील चाचा मेरे पास आए और रोते हुए बोले "... बेटा, बस यही देखना बचा था, जला दो..! तुम्हारे पिताजी को मैं बिलकुल भी नहीं बताऊँगा" और कहते हुए अपने कुर्ते से माचिस निकाल कर मेरे हाथ पर रख दी और मैं तो जैसे पत्थर बन गया.

एक पल में हज़ार बार मरना क्या होता है, मैंने उस वक़्त महसूस किया. आज से पहले ये वाक़या सिर्फ़ ख़लील चचा और मेरे बीच तक रहा और आज मैं इसीलिए साझा कर रहा हूँ  कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में ख़लील चचा तो अल्लाह को प्यारे हो मगर वो लम्हा मेरे ज़ेहन में ताज़ा भी रहा और हर बार मेरा दम घोंटता रहा.

दशकों बीत गए हैं पर आज भी जब लोग धर्म-जाति के नाम पर दीवार खींचते हैं, ऐसा लगता कि चचा की रूह आसमान से कहीं मुझे ताक रही है.

शहरों में चल रही 'सहिष्णुता और असहिष्णुता' की कौआ पंचायत को शहर में ही छोड़कर अपने गाँव जा रहा हूँ. वश भर यही प्रयास करता हूँ कि साल भर टुकड़े कमाने से इतर ज़रा सा वक़्त अपनी ज़मीन पर भी बिताया जाए, कुछ धागों को मज़बूती के लिए सिर्फ़ रिश्तों की गरमी चाहिए होती है, और कुछ नहीं. ज़िंदगी सच में ही चार दिन की है और दो गुज़र चुके हैं ... बाक़ी के दो भी मुहब्बत से गुज़रें तो बेहतर होगा...

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अमेठी: एक खुली किताब के पन्ने

जब आप असफल होते हैं तो आपके पास अनुभव होता है और जब सफल, तो घमण्ड... इसीलिए अमेठी में हमारे अनुभव तो इतने हैं कि कोई अनुभव-काण्ड भी लिखा जा सकता है, लेकिन मैं यहाँ पर आपका ध्यान कुछ प्रायोजित और पोषित मीडिया द्वारा फैलाई गयी स्तरहीन खबरों, कुमार के चारित्रिक हनन के प्रयासों की ओर लाना चाहता हूँ. वो लोग जिन्होंने पत्रकारिता के आदर्श और मापदंडों को लात मारकर, पेज ३ पार्टियों के पास और कोटे के फ्लॅट बटोरे हों, जो खुद उगाही के साबित आरोपों में तिहाड़ रहकर आयें हों, या जिनकी वेबसाइट सिर्फ़ फिल्टरड पॉर्न से चलती हो...हमेशा खबरें बनाने की कोशिश में रहते हैं. अमेठी चुनाव में मीडिया और मेटीरियल हॅंडल करते समय मैने ऐसे कई अवसरवादियों को देखा है जो शराब की एक बोतल के लिए अपने पिता-भाई और शायद देश के खिलाफ भी अपनी बिकी क़लम चलाने से ना चूकें.

कुमार विश्वास में किसी अन्य कलाकार या राजनीतिक की तुलना में हज़ारों कमियां है, सबसे पहली है जनमानस के लिए उनकी उपलब्धता, उनका बेबाकी से बतियाना, विचारों का खुलापन... और यही सब उन्हें परेशान भी करती रहीं हैं क्योंकि अभी तक की राजनीति में कुटिलता के लिए तो स्थान है, सरलता के लिए नहीं. लेकिन जो शख्स इस राजनीति को बदलने की ज़िद में अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर आया हो, उसे कुटिलता के कनख़ज़ूरे घेर तो सकते हैं लेकिन उसको गिरा नहीं सकते. टीआरपी की हवस में अपने कपड़े उतार चुके, मीडिया के कुछ दलाल, बेसिर पैर का मसाला बेचकर भले ही कुछ देर तक अपनी लालटेन जला लें, सच के सूरज की किरण किसी की मोहताज़ नहीं होती.

राजनीति से मेरा तलवार- ढाल जैसा रिश्ता रहा है, साथ-साथ तो नहीँ, आस पास रहा हूँ, टकराता रहा हूँ पर घुला कभी नहीं. हिन्दी साहित्य और कविता की भूख रही और ऐसे ही किसी माध्यम से डा. कुमार विश्वास से मुलाकात हो गयी. ये उस दौर की बात है जब अन्ना हज़ारे महाराष्ट्र की परिधि में जाने जाते थे, अरविंद केजरीवाल किसी गली में परिवर्तन और स्वराज की परिभाषा समझा रहे होंगे और देश के अधिकतम हिन्दी प्रेमी युवा 'कोई दीवाना कहता है' या 'एक पगली लड़की' गा-सुनकर अपनी मुहब्बत कम-ज़्यादा कर रहे होंगे. सच तो ये है कि मुझे कुमार से मिलने के 2 हफ्ते बाद चला की ये वही शख्स है जिसकी कुछ कविताएँ मैं खुद पढ़ चुका था दरअसल मेरे अनुमान से कवि तो झोला-डायरी, दाढ़ी और ग़रीबी का पर्याय था. मिलना जुलना बढ़ा तो बात देश, फिर देश प्रेम और बदलाव तक जा पहुँची और एक दिन जाना कि कुमार ने अपने बचपन के साथी मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी, और आज़ाद हिन्दुस्तान के इतिहास ने जनजागरण का वो स्वरूप देखा जो कई तानाशाहों की अस्थिमज्जा में सिहरन पैदा कर दे. मैने सच में कवि कुमार विश्वास को आंदोलनकारी कुमार में बदलते देखा. अपनी कोर्पोरेट ज़िंदगी से कुछ समय चुराकर, डरते-छुपते कई बार मैं भी उस लड़ाई का साक्षी बना और हमेशा विस्मित रहा की 5 स्टार जीवनशैली जीने वाला, टीवी और स्टेज का फ़नकार आख़िर यहॉं क्या हासिल करेगा? एक बार हिम्मत जुटाकर मैने पूंछ ही लिया तो कुमार ने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा " मैं दो जीवन जीता हूँ, पहला जो मेरे देश के प्रति कर्तव्य है और दूसरा एक स्टार कवि का... कविता और शायरी से तो लोग खुश होते हैं, पर मुझे खुशी मिलती है जब मैं देश और समाज़ के लिए कुछ अच्छा करता हूँ ..."

इंडिया अगेन्स्ट करप्शन से लेकर आम आदमी पार्टी के गठन तक मैने एक कवि को कुचलते, एक आंदोलनकारी को कई पिटते और एक समग्र नेता को जन्म लेते देखा. कई बातों पर मैं उनसे सहमत नहीं रहा, क्योंकि तब तक मेरी दृष्टि में सभ्य समाज में आंदोलन के लिए ज़रूरत और जगह, दोनों ही नहीं थी. निसंदेह, अन्ना आंदोलन ने अरविंद और कुमार जैसे आंदोलनकारियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई लेकिन इस पहचान की अपनी कीमत रही, कई दोस्त, दुश्मन बन गये... जो कल तक मुशायरों और काव्य-गोष्ठियों में वाह-वाह करते थे, वो हाय-हाय करने लगे, पत्थरों ने फूलों की जगह ले ली, निज़ी ज़िंदगी तो खत्म हुई ही, लोगों ने परिवार और बच्चों को तक ना बख्शा. मैंने हालाँकि कभी कुमार को इन सबसे परेशान नहीं देखा, और हमेशा मुस्कुराकर हर सवाल को झेलते और हर बवाल को टालते देखा.

कल जब मैने एक टीवी चैनल पर उनको देखा तो शायद मुझे उनके चेहरे में वो दिखा जो बहुत लोग ना देख पायें हों, मैं उनसे बातचीत तो नहीं कर पाया पर मुझे लगा कि लोगों को वो सब भी पता लगना चाहिए जो  उससे बिल्कुल ही अलग है सच है, पर दिखाया या बताया नहीं जाता क्योंकि कोई पोषित मीडिया, अख़बार या वेबसाइट, ट्विटर- फ़ेसबुक और व्हाट्सअप पर बैठ कर मिशनरी निन्दक बन कर किसी का भी चरित्र चित्रण सिर्फ़ इसीलिए करते हैं कि २ बोटी और एक पेग की व्यवस्था हो सके.

मैं उन कुछ लोगों में से हूँ जो ये जानते हैं कि कुमार विश्वास कभी भी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे, लोक सभा तो बड़ी दूर की बात... पार्टी के किसी पद पर रहने की उनकी इच्छा ना थी, अगर उनके मन में निर्भया और गुड़िया कांडों के दौरान दिखाई गयी कॉंग्रेस सरकार की, और ख़ासकर राहुल गाँधी की व्यावहारिक निष्ठुरता का विषाद ना होता तो सम्भवतः वंशवाद के खिलाफ उनका जगजाहिर रण ना ही होता. दिसंबर २३, २०१४ को मेरे जन्मदिन पर उनका फोन आया, और बातों ही बातों में उन्होने मुझे अमेठी चलने के लिए तैयार रहने को कहा, तब तक उनका चुनाव लड़ना सिर्फ़ खबरनवीसों से ही सुना था... पता चला की संजय सिंह और मनीष सिसोदिया ने राहुल गाँधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की सार्वजनिक घोषणा कुमार विश्वास से बिना पूछे ही कर दी थी. कुमार की पत्नी और मैं उन कुछ लोंगो में से थे जो इस निर्णय के विरुद्ध थे परंतु मुखर नहीं हुए क्योंकि यदि हम कुछ कहते भी तो शायद कोई सुनता भी नहीं. अन्तोगत्वा, कुछ इष्तमित्रों के साथ बैठकर हम सब अमेठी जाने की तैयारियों में जुट गये, मूलतः उत्तर प्रदेश का होने और ख़ासकर उस इलाक़े के मेरे अनुभवों के आधार पर, मेरी ज़िम्मेदारियाँ भी तय कर दी गयीं, २ और हिम्मतवाले साथियों ने वहाँ जाकर रहने का बीड़ा उठाया और हम आगे बढ़ चले.

ज़मीनी हक़ीकत:

दुनियाँ भर में गाँधी परिवार के नाम से जोड़े जाने वाले शहर की वास्तविकता ये है कि एक अच्छे होटेल या गेस्ट हाउस तो दूर, एक धर्मशाला भी इस कस्बे (शहर कहना शहर का अपमान होगा) में नहीं है, खाने के लिए हाइवे पर होने वाले ढाबों से भी निम्नतर एक दो भोजनालय ही हैं. कई दिन तक भटकने की बाद भी हमारे साथियों को एक भी ठिकाना ना मिला जिसे हम अपना मकान बना सकें, कुछ लोग तैयार हुए भी तो कॉंग्रेस के लोकल ठेकेदारों के डर से पलट भी गये. १२ जनवरी २०१४ को कुमार विश्वास की प्रस्तावित रैली होने तक हमारे पास रहने के लिए एक कमरा भी नहीं था, एक स्थानीय कार्यकर्ता के घर हमने पहली रात बिताई. रैली में जुटी भीड़ ऐतिहासिक थी, उससे ना सिर्फ़ हमारा बल्कि क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं का उत्साह और भरोसा बढ़ा. अमेठी के इतिहास में पहली बार किसी ने कांग्रेस के किले पर जाकर ललकारा था.  काफ़ी मशक्कत के बाद हमें कस्बे के बाहरी तरफ एक अंडर कंस्ट्रक्शन मकान मिला जो काम भर का था. गली-गली फैले एजेंटों के डर से ना तो कोई खाना बनाने वाला तैयार हुआ ना कोई साफ़-सफ़ाई वाला, आलम ये था की खुद कुमार विश्वास सहित अन्य साथियों ने कई बार झाड़ू भी लगाइ, अपने बर्तन भी साफ़ किए, हम सबने कई-कई बार सिर्फ़ दाल-चावल खाए क्योंकि इससे अधिक पाक कला किसी को आती ही ना थी. कुछ महिला कार्यकर्ताओं ने समय समय पर पूरी टीम के लिए भोजन भी बनाया, इन में से कुछ तो सिर्फ़ बदलाव के लिए लड़ाई में साथ देने अपने भविष्य को दाँव पर लगाकर आईं थी. पुराने मित्रों से कह कर एक रसोइए की व्यवस्था होने तक, ऐसा कई दिन तक चलता रहा...किसी को कोई शिक़ायत ना थी, दिन भर गाँव गाँव जाकर प्रचार, जन-जागरण चलता, रात में किसी कार्यकर्ता की गज़ल, किसी के चुटकुलों पर ठहाके होते या फिर खुद प्रत्याशी को कुछ ना कुछ सुनाना पड़ता था. ना बिस्तर थे, और ना ज़रूरत भर की बिछायत, आपस में इतने घुल मिल गये थे कि विकटतम परिस्थितियों से लड़ते लड़ते, लाठी-फर्से खाते, पिट-पीटाते, पुलिस-प्रशासन का दमन सहते हुए हमने अमेठी लोकसभा के १६५७ में से १२०० से अधिक गाँवों में कुमार विश्वास को लोगों से मिलते -उनकी पीड़ा जानते समझते पाया. कुमार चुनाव तो नहीं जीत सके, लेकिन अमेठी की उस भट्टी ने उनको निज़ी और राजनीतिक रूप में बहुत अधिक सीख दी. मित्रों की भी पहचान हुई, कुछ छूटे, कुछ टूटे, हज़ारों बिखरे और लाखों जुड़े.

कुमार को जोड़कर ७ लोगों की एक कोर टीम बनाई गयी, सबको अपने कौशल और अनुभव के आधार पर काम बाँटे गये, किसी को आफ़िस, किसी को प्रेस-मीडिया, किसी को वालंटियर मॅनेज्मेंट, फंड जेनरेशन, मेटीरियल मॅनेज्मेंट...हम मैं से सभी ने अपने अपने जीवन दाँव पर लगा दिए थे, ये अति-उत्साह तो बिल्कुल ना था, शायद ज़ुनून सबसे नज़दीक का शब्द हो.

उन ५-६ महीनों में हमने कई जीवन जी लिए.. राजनीतिक द्वेष में विपक्ष ने वो सब किया जो हम बचपन में चंद्रकान्ता धारावाहिक में देखते थे, विष्कन्याओं की जगह बाहर से बुलाई गयी लड़कियों को कार्यकर्ता बना-बना कर भेजा गया, समर्थन की थाली लेकर कई ग्राम प्रधानो को भेजा गया ताकि हम उसी में उंझे रहें, पुरानी काव्य गोष्ठियों में कहे गये लतीफों की क्लिप्स बनाकर धार्मिक उन्माद भी फैलाया गया, चाकू-छुरे भी मारे गये, और इसके ऊपर पोलीस की ज़्यादतियाँ, घण्टों पोलीस स्टेशन में बिठाकर पूँछताछ ताकि हम उसी में उलझे रहें. हमारे व्यवहार से कई पुलिस अधिकारी भी मित्रवत हो गये थे, और वो अपनी मज़बूरी जाहिर करते हुए बताया करते थे कि किस तरह ना सिर्फ़ कांग्रेस बल्कि उत्तर प्रदेश प्रशासन, केन्द्रीय गृह मंत्रालय, गुप्तचर विभाग ने सिर्फ़ एक आदमी को रोकने और तोड़ने के जाल बुने थे. कुछ तथाकथित कार्यकर्ताओं के कार्य कलाप मुझे हमेशा ही संदेहास्पद लगे, मेरे अलावा कुछ और कोर मेंबर भी ऐसी ही राय रखते थे, लेकिन हम ऐसी जगह काम कर रहे थे जहाँ डर से लोग हमसे बात तो दूर, पास आने से डरते थे की कहीं लोकल ठेकेदार ना देख ले इसीलिए हमारे लिए संख्या का होना भी उतना आवश्यक था.

अगर मैं ये कहूँ कि मूलभूत संशाधनों के अलावा हमारे पास बाकी सब था, तो शायद ज़्यादा उचित होगा, हम हमेशा जूझते ही रहे, जब पैसे कम पड़ गये तो मासिक तनख़्वाह पाने वाले हम लोगों ने अपनी जमा पूंजी भी लगा दी, कुछ वेंडर्स ने जो हो सका सहयोग किया, हम हमेशा उनके आभारी ही रहेंगे क्योंकि उनको कुमार या हमारे जैसे विपलवियों से उनको भला क्या हासिल होगा?

राजनीति में स्तरहीनता का इससे बड़ा उदाहरण और भला क्या होगा कि एक साल बाद ऐसी फोटॉशोप्ड इमेजों को मसाला बना-बना कर फैलाया जा रहा है, हद तो तब होती है जब धाकड़ अँग्रेज़ी बोलकर नेशन वांट्स टू नो चिल्लाने वाले चैनल्स घंटों लंबी बहस करते हैं. डीएनए जैसे अख़बार बिना किसी सत्यता को जाने स्टोरी लिख डालते हैं, वेबदुनिया साइट फोटो फ्लश चलती हैं. इनमें से किसी ने भी ये जानने की कोशिश नहीं की होगी कि आरोप लगाने बाले की सत्यता क्या है? अमेठी में होने वाले छोटे-बड़े खर्चों की ज़िम्मेदारी मेरी थी, उनकी व्यवस्था करना और उनके भुगतान की भी, कौन हैं वो जो पैसे दे गया..? कुमार से मिलने वाला हर एक आदमी हम ६ कोर मेमेबर्स के वगैर मिल ही नहीं सकता था. ठस-ठस के भरे कमरों में भला कौन सी मुलाक़ात हो गयी ? रातें या तो जाग-जाग कर निकलती थी या फिर भाग-भाग कर...

बहरहाल, मेरा इरादा ना तो सफाई देने का है ना बर्दाश्त करने का... ऐसे प्रयास किसी भी क्षमा से ऊपर है, और निजता के उल्लघन के ऐसे प्रयासों को मुँहतोड़ ज़बाव बहुत ज़रूरी है ताकि उन्हें सबक मिल सके जो किसी की प्रतिष्ठा बेचकर अपनी रोटी, बोटी चलाते रहे हैं.

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Lest we forget them...

गणतंत्र दिवस की शुभ कामनायें ।।

ये पर्व निर्विवादित रूप से मेरे बचपन के सबसे मनपसंद त्योहारों में से एक रहा है। महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जातीं थीं, शायद ही कोई समारोह मुझसे छूटा होगा। संघ संचालित स्कूल था और देशभक्ति से भरे साहित्य की कमी ना थी। शिक्षक ऐसे थे कि आज दिया लेकर निकलो तो भी ना मिलें, वो हम सब में सुभाष, भगत, आजाद ही देखते थे और हम उनमें भगवान।

नये कपड़े मिलते थे और इस बात की स्पर्धा थी कि स्कूल सेनापति (now school captain) होने के नाते मेरी कमीज सबसे ज्यादा सफेद दिखे। वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या यदि मैं भारत का प्रधानमंत्री होता पर भाषण; इनाम से ज्यादा ध्यान तालियों पर रहता था और जब आगे की कुर्सियों पर बैठे मेरे पिता जी और दीदी गर्व से मुस्कुराते तो अपने आपको सच में प्रधानमंत्री से कम न समझता।

छोटे से स्कूलों में बहूत साधारण तनख्वाह पाने वाले वो असाधारण शिक्षक अब नहीं मिलते; अब स्कूल 5 स्टार हो गये हैं, सुना है कि नयी किताबों में आजाद भारत के घोटालेबाज नेताओं ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद की जगह ले ली है।

जन साधारण भी गणतंत्र की महत्ता समझे, क्रांतिकारियों के बलिदान को याद रखे इसीलिए इसे पर्व का रूप दिया गया। दु:खद तो ये है कि उत्साह मनाना तो दूर...बूंदी और लहिया बंटना भी अब सरकारी स्कूलों तक सिमट गया है। कान्वेंट स्कूलों ने तो आजादी के त्योहारों को छुट्टी बनाकर छोड़ दिया है. लाखों रुपये फीस बसूलने वाले स्कूलों के मालिक ज्यादातर राजनेता ही हैँ और किसी सरकारी आयोजन में झण्डारोहण करते पाये जाते हैँ।

मुझे नहीं पता कि आने वाली पीढी ये जान भी पायेगी कि जिस स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवसों में उनके स्कूल छुट्टी मनाते हैं उसकी कीमत कई लोगों के बलिदान से चुकाई गयी है।

"जिस आजादी को भगत सिंह, पाने फांसी के पड़े फन्द
वो आजादी बतलाओ किस बंगले में कर दी गयी बंद ?"

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Kumar Vs Yuvraaj: A battle between Values, Virtues and Vested interests

Parivartan Series: Amethi

The battle has begun… India, world’s largest democracy, is going to witness its most awaited showdown when people of this great nation will cast their votes to elect their representatives, their members of parliament who, by all definition, will work for the development, security and many more essential services for their people.

I know Dr. Kumar Vishvas as a Professor, a Poet and in last 2 years I have seen him transforming from a revolutionary to leader of mass. I saw him fighting for the causes be it Nirbhaya rape case or Anna’s movement on bringing JanLokpal. Recently, I had an opportunity to travel and experience the pulse of Amethi where Kumar has challenged the iconic root of dynastic politics, The Gandhi dynasty.

Integrity or Identity:

“Credentials are essential…” be it business or politics. Many times we confuse ourselves with what we mean by it. To be a Great leader, you need not to be from a political background. No matter whether your ancestors held positions and offices in Govt. What it requires the most is “How better, effectively, fast & more cohesively one can understand people’s problems, work out amicable solutions and execute them as they were perceived. To understand their issues, you just can’t do Aerial Surveys and behave like guest professors.

It is evident that in his 10 yrs tenure as MP from Amethi, Rahul Gandhi had not spent adequate time listening to the people who had voted for him. Congress scion has another fundamental flaw that he is, arguably, supported by agents who take care of his “political business” when he heads the “board meetings” at his Delhi office. Rahul Gandhi has miserably failed in earning that much talked distinction that ought to be possessed by a leader who aspires to be Prime Minister of India. His public orations have earned ire than appreciation. I wont be wrong to say that he continues to score self-goals that are turning to be suicidal for his party and instead helped his rivals for their political vendetta.

On other hands, Kumar offers a candidature that has all it needs to be a representative of masses. He is submissive and not only hears you patiently but gets involved with you. He tries to make you comfortable irrespective of your background, caste or religion and even political alignment for that matter. His upbringings, socio-economic and educational backgrounds have nurtured him to be acceptable by others. As a poet he has earned much deserved fame & has better acceptance amongst people of various age groups and this is perhaps his new journey to further strengthen and enhance his persona, vividly.

Kumar has distinctions in public speaking; he speaks flawlessly and without any script while Rahul needs prompters, pre-written scripts or misses the track when he is asked tough questions. For his party, Kumar is most demanded, most desired and most accepted speaker while where does Rahul stand is a matter of debate.

 

Values vs Virtues:

The character of election campaign at Amethi is completely different from what is found in other parts of the country. On one hand you have people who have been on receiving hands since last six decades while on the other side of it you will find liaisoners who have nourished dynastic politics for their vested interests. In my interactions with locals, I could not find that one most required assurance, confidence or a will which makes a person feel important for his MP, his own representative amongst nation’s law makers. Rahul, seemingly, restricts his stay within a circuit house at mutthiganj and interacts with set of people who never interact with ‘People’.  Rahul has not been accessible to most of them in last 10 yrs. Herd of Villagers from Chhatoh, parshadepur, gauriganj and nearby villages told me that there marathon efforts go in vein and they always struggle to even get a glimpse of his MP.

It would be appropriate to classify people of Amethi into two sections to understand them better; (1) Old-age conservative people, (2) New Age young enthusiasts. While the latter has access to information, knows what is happening around and what could be best for their own multi-facet development, the earlier are yet to come out from their shells. For first kind of people, affiliations and old bindings are important while for youth, socio-educational development have become the priority. They are found coming in open and demanding for what their parents have been deprived. They have gathered courage to ask questions on Where, When and How multi crore funds have been spent? Where are schools? Where are degree colleges? Where are roads and other basic facilities? What has been done for the skill development & employment creation?  These basic but essential questions are indeed challenge for Gandhi scion who have enjoyed power due to his legacy.

Value based political representation is much needed in the constituencies like Amethi, than the virtues of old association. You just cant feed your kids with your one-sided relationship & emotional bonding. To make them grow and sustain, you have to provide them food, shelter & education and help them develop a value system so that they can contribute well to the society.

Battlefield of Amethi:

Devastated Demography:

Amethi is amongst one of the most talked & most watched constituency that is known as Congress bastion from last 60 years. Be it Indira Gandhi, Rajiv or Sanjay and “undeclared PM candidate of Congress” Rahul Gandhi. Despite its own struggle and share of betrayals, Amethi gave them what all they wanted, The Political mileage. But in the history of this culturally rich soil, this constituency has been known as congress foothold and nothing more than this. Spread across 256 Sq km area, comprising 05 legislative constituencies, 16 blocks and approx. 1300 Gram panchayats…Amethi still awaits its share of growth & development.

Jagdishpur, Amethi & Gauriganj are amongst main towns of Amethi which was made a district by Mayawati led BSP govt. Perhaps the objective could have been to polarize vote bank in the name of giving a district level facilities but rivalries of parties took its toll and Amethi missed the bus. At the onset of his political journey from Amethi, Kumar was able to bring shivers in Gandhi camp. I remember how hurriedly, Cabinet Minister for Road and Transport was sent to Amethi to give a nitrogen push to road construction & other turtle speeded projects. I wonder why these politicians always forget that no cosmetic surgery can get you the glow of reality? You can’t succeed and score well if you are studying a night before writing your exam papers.

Distance between lip & cup:

Get down off the roads, drive 3 km deeper and what you will witness will be inverse of what the nation has been hearing for last so many years. Leave apart the facilities like roads, schools and hospitals; there are 100s of villages, struggling for potable water and they still depend upon the natural water reservoirs that evaporate as the summers arrive.

•   Believing onto what residents claim that (between Oct’13 to Feb’14) more than 18 ladies were forced to deliver their babies on the roads while commuting to nearest hospital, 130 km away at Raebareily.

•   Govt Schools exits on records. Many of the schools that I had visited during my week-long stay at Amethi, were in worst state, I have ever seen. Students were forced to sit on the ground to write their exams. Roofs were missing from building; people have made them dump yards and rotting garbage.

•   100 acres of lands were acquired in the name of developments from the performing farmers. One can find from the records that much hyped industrial development did give nothing to the locals here. Over the time all small-mid sized industries turned metamorphous. They vanished faster than they arrived and locals were left trapped in the game of politics. Industrialists were given subsidies for no traces, they defaulted and vanished and farmers were left to be laborers.

67 years have passed ever since India became independent and embarked on the path of growth and making efforts to make it a true democracy where Governance will be by The People-For the people-To the people.  I will be called senseless if I say there has been no development & growth in last 6 decades. Of course, we have moved far ahead from where we started six decades back but if I am allowed to relative comparison of what we wanted to be and what we could have been… I am confident; I will get more affirmations than criticism.

 

   || Sarve bahvantu Sukhinah, Sarve Santu Niraamaya||

 

|| Sarve Bhadrani Pashyantu, Maa kashchid dukh bhaagbavet...||

 

 

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Bharat Bhagya Vidhata: The Lost Path

In June, 1964 when Shri Lal Bahadur Shastri ji sworn in as Prime Minister of India, country was actually going thru a tough phase of poverty, insecurity, unemployment and polarised socioeconomics after partition. The need of time was to encourage agricultural produce, bring in self-sustainability and therefore he called for "Jai Jawaan- Jai Kisaan".

67 long years... since our independence, have gone by. India has taken the world on various parameters; we emerged as think tank for IT, grew our Atomic, Nuclear and defence power, evolved scientific researches,  been to moon and have developed a huge market for trans-national companies to come, participate in our growth & in the exchange have ventured in various industries of nations across the Globe. Ever since we attained our independence, various 5 years plans, planning commissions, bundles of schemes to empower people and provide them good education for better employment and thus life.. have been announced and perhaps implemented, let say at least partially. while we have come a long way now but an important and essential sector of our economy has been grossly ignored and overlooked. Agriculture… has not been given it due attention and therefore I write with complete responsibility that having ignored its importance, we have indeed embarked on a path that is more fragile and less assured.

Our history is evident to understand that 75% of India's population still lives in rural india despite accelerated urbanisation which is less growth driven and more to do with selfishness of politicians and land/ real estate mafias. Importance of Agriculture sector in Indian economy has always been very significant. As per reports published by various institutions, India ranks 2nd largest producer of Agro products, farm output and associated sectors such as forestry, fishery & milk products. All these sectors accounted 17% of GDP and considered to have deployed approx 50% of workforce, as evaluated in 2009.

The painful, shocking and concerning fact is that economic contribution of agriculture to India's GDP is gradually and steadily declining. While India is moving ahead with its broad-based economic growth, agriculture is demographically the broadest economic sector and plays a significant role in the overall socio-economic fabric of India. Referring to the census done during 2011, India now have 95.8 million people for whom farming is their main occupation which is indeed less than 8% of total population base. The count has come down from 103 million in 2001 and 110 million in 1991 and this also Includes small time farmers who are marginally aligned and engaged into land cultivation (22.8 million) which is still less than 10% of the population.

MGNREGA: The other side of Coin

In 2005, when UPA Govt introduced much talked MGNREGA scheme which was aimed to be given employment guarantee to each work who is above 18 years of age, the nation has a perspective that this plan is going to change the overall socio-economic paradigm for good. This scheme though had helped drive many people to get work but the key objective of plan was lost mid way in its own execution and within prevailing system which has many flaws. No one can ensure or comment (except political parties) that MGNREGA funds have been utilised to its fullest or even maximum per say. As per reports published by Ministry of Rural development and Planning commission, a huge sum of Rs 1,10,000 cr have been spent by now. We may debate about the final delivery of the scheme but objective was very broad and intent was good. It is corruption against which such a good plan has succumbed.

By sharing the above mentioned fact about MGNREGA, my very purpose is to highlight that fact that while Govt has given its focus on providing employment to people by building roads, canals, ponds, schools & hospitals (ironically some of them were though constructed on papers and could never go beyond a red taped file), it was grossly overlooked that if Agriculture sector was considered for giving employment opportunities, there could have been multiple beneficiaries and a multifold growth could have been attained. If people were trained and attracted to work in the farms, agro produced would have increased, a sector could have got focus, sustainability on food, grains or milk products would have improved.

Today, as the facts are evident, there is extreme scarcity of agricultural labourers. Villagers have either migrated to cities in search of better life and substantial earnings or they have become defunct and are no longer ready to work in the farms. This is therefore evident that despite MGNREGA kind of programs, the gradual migration has rather increased and there is increasing shortage of workers now.  Even if we put together all cultivators and agricultural labourers in count, the number would be around 263 million (22 % of the national population). Interestingly, this reduced figure comes after a few big states have actually reported a rise in the total number of cultivators. Since 85 per cent of all marginal workers reported more than a 100 days work, this could possibly reflect the reverse pull of MNREGA, among other factors).

MGNREGA Sameeksha report-2012 published by Ministry of Rural development states the facts that an average of Rs 120-191 per person per day wage has been attained under the scheme and that average wage has increased by 81% ever since the MGNREGA is introduced. It is also reported that 80% households are being paid directly thru banks/post office accounts (a questionable fact indeed). As per data, 146 lakhs works have been performed which are of electrification, rural road connectivity (19%), irrigation (14%), water conservation and harvesting (25%), flood and drought protection (12%) and construction of houses for SC/ST (14%) etc. Keeping all these statistics in perspective, the very first question that appears here is if aforesaid details are to be believed, what is compelling these people to migrate out of their villages despite a guaranteed income & employment? And the answers are;

  • Rs 191 do not reach to person whom it has been intended for. She/he merely gets Rs 80-90 which is 50% of planned wage.
  • Since, Rs 80-90 are sufficient (arguably) for day’s expenditure & livelihood in the villages, one can buy rice, flour & dals/vegetables & oil to cook food for a day…it look viable for a worker to agree for Rs 80-90 without actually working.
  • The village head, contractors, officials gang up and pick their own shares from balance of the amount.
  • From the leftover amount the labourer buys liquor from the syndicate run by same set of people who are either contractor or village heads. A magazine Down to Earth has done a very good expose.   The magazine gives the example of one Sunil Verma, reportedly a village head of Dakkin panchayat who has assets worth more than Rs 3.75 crore, investments over Rs 35 lakh in insurance policies and nearly 14 bank accounts. Village heads who earn around Rs 8000 per month are purchasing guns, SUVs and appointing private guards for their security? Isn’t it evident that how the money planned to be given to poor is being looted in an organised way?
  • There are fake job cards that have been issued to scamsters,  Fake construction works that indeed don’t take place, fictitious bills and claims, payments being made to ghost firms and many more ways of corruption.

I believe that MGNREGA is an example of helicopter economics where the government plans to spend a huge amount of tax-payers money to guarantee jobs (or to meet their political objectives) to poor people of this country but without adequate checks and balances, without correcting the loopholes or rather supporting the defaulters. Govt. is repeatedly being failed to figure out whether the money is actually being spent for what it is meant for and indeed being siphoned off in various ways. The village heads in Bihar would have operated along similar lines. The people MGNREGA is benefiting the most, are the village heads and government officials, who are standing right under the helicopter from which the government is dropping money.

 

The Need of Hour:

Nation requires immediate attention on its core industry, Agriculture. There are essential decisions, changes and policy correction that are required to be taken at accelerated pace. Not only financial support but also training, marketing & skill developments are some aspects, which are to be looked upon. An emergence of migration from village to city is not only hampering agro production but also leading to a disastrous situation for the time to come.

Training: Farmers needs to be given qualitative input so as to they can get best out of the work they are putting up. They need to be taught about the high value crops and modern methods of agriculture that is scientifically robust and more beneficial. Block Development officers are to be engaged with group of farmers and facilitate them. Important activities such as Soil testing, availability of appropriate Seeds & fertilizers are some of the work which can turn around the situation if handled properly.

Skill Development: Across country, conservative way of Agriculture is another challenge. Farmers do not venture into good crops because they lack knowledge, exposure and also know how. Understanding of improved and scientific methods, skills to handle new equipment and tools, exposure about outer world and correct information about market are usually found missing. They only produce what their ancestors had been doing and what they had been taught about. While there are plans and provisions made in development policies but it does not reach to the right people. Ensuring that farmers are given adequate skill development training, knowing what is in demand, what can be produced in less expenditure and hassle and yield them better returns, will surely help attain the purpose.

 

The need of hour is participation, cooperative initiatives, transparent and speedy execution of plans that are required to bring positive change. Appropriate contribution should come from education and learning where new generation should be taught and encouraged about India’s biggest industry.

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