Brajesh Singh

Poetry

header photo

हृदय परिवर्तन

सर..! एअरपोर्ट जाने के लिये थोड़ा जल्दी निकलिए, आज ट्राफिक कुछ ज़्यादा ही है. देखा कि उम्र के लगभग पचास पड़ाव पार कर चुका एक शख़्स मेरा सामान लिए खड़ा था.
सर .. लगता है दिवाली पर घर जा रहे हैं? कहाँ के रहने वाले हैं आप?
उसकी गर्मजोशी देखकर मैं चुप नहीं रह पाया..

जी..! मैं घर जा रहा हूँ, पर अभी लख़नऊ...आपका नाम ? बात बढ़ाने के लिए मैने पूँछा, कहाँ के रहने वाले हो ?

सर, ख़लील नाम है... मुज़्ज़फ़रनगर के पास मेरा गाँव है. यही कोई दो-ढाई साल से टैक्सी चला रहा हूँ, मेरा लड़का यहाँ इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है. वहाँ थोड़ी सी प्रॉब्लम थी, बच्चे के लिए इधर दिल्ली आ गये... सब छोड़ कर. कहते-कहते उसका गला भर सा गया.

खिड़की का काँच उतारकर मैंने भी मुद्दा बदलने की कोशिश की. मन का जहाज़ मुझे मेरे बचपन तरफ़ उड़ा ले गया.

उस समय दिवाली की अगली सुबह-सुबह शरीफ़, लियाक़त और अश्फ़ाक अपनी ढोलक-ढपली लेकर आ धमकते थे, लक्ष्मी पूजन वाली मिठाई और रात का बचा हुआ खाना उनकी सबसे बड़ी उम्मीद थी और उन्हें उसमें कोई ऐतराज़ भी ना था. झब्बे धोभी, बनवारी नाई, चरने चमार, वहीदन...सब एक साथ घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठ जाते थे और मेरी दादी पत्तल बिछवाकर उनमें पूरी-कचौरी, सब्ज़ी- भाजी परोसवाया दिया करती थीं, एक साथ हँस खा कर, दुआएँ देते चले जाते थे, कभी भी महसूस नहीं हुआ कि खान-पान भी बँटवारा करवा सकता है.

पहले दिवाली पूजन वाले बताशे, ख़ील- गट्टे तो हमारे क़स्बे में मुसलमान ही बेचा करते थे और मुझे अपनी दुकानों पर देखकर जितने प्यार से हिंदू व्यापारी मिलते थे उतनी ही मुहब्बत से मुसलमान भी... बड़ी साफ़ बात तो ये थी कि मेरी पहचान मेरी जाति-धर्म से नहीं, मेरे पिता जी के सम्मान और मेरे व्यवहार से थी. क़स्बे के बाज़ार में ख़लील चचा की जूते-चप्पल बेचने की सबसे बड़ी दुकान थी, इलाक़े का शायद ही कोई शख़्स हो जिसका उनसे वास्ता ना पड़ा हो. मुझे यूँ तो ज़्यादातर स्कूल वाले जूते ही पहनने होते थे लेकिन कभी कभार चचा शहर अक्सर नयी डिज़ाइन वाले जोड़े ख़ास मेरे लिए लेकर आते थे और उन जूतों को पहनकर मेरे ठाट ही कुछ और होते थे.

मेरी उम्र लगभग बारह-तेरह साल की रही होगी जब राम मंदिर आंदोलन की लपट हमारे गाँव तक भी पहुँच गयी थीं, राम के नाम पर ईंटें और पैसे इकट्ठे किया जा रहे थे और अचानक ख़बर आई की कार सेवकों पर गोलियाँ चलाईं गयीं हैं... ख़बर आग बन गयी, कुछ लोगों के साथ मैं भी भीड़ का हिस्सा बन गया, अंदर का जानवर कुलबुलाने लगा, ऐसा सिखाया गया कि फ़ैज़ाबाद का बदला मुझे ही लेना होगा. पता नहीं कब कैसे किसने मुसलमानों की दुकानों में आग लगाने की आवाज़ लगाई...भीड़ से कुछ लोगों ने दुकानों के ताले -शटर तोड़ने की बेनतीजा कोशिश की, फिर आग लगाने पर बन आयी और मैं जैसे ही आगे बढ़ा देखे कोने में ख़लील चचा खड़े थे, निश्तेज चेहरे पर आँसू बह रहे थे, हाथ और होंठ काँप रहे थे... ख़लील चाचा मेरे पास आए और रोते हुए बोले "... बेटा, बस यही देखना बचा था, जला दो..! तुम्हारे पिताजी को मैं बिलकुल भी नहीं बताऊँगा" और कहते हुए अपने कुर्ते से माचिस निकाल कर मेरे हाथ पर रख दी और मैं तो जैसे पत्थर बन गया.

एक पल में हज़ार बार मरना क्या होता है, मैंने उस वक़्त महसूस किया. आज से पहले ये वाक़या सिर्फ़ ख़लील चचा और मेरे बीच तक रहा और आज मैं इसीलिए साझा कर रहा हूँ  कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में ख़लील चचा तो अल्लाह को प्यारे हो मगर वो लम्हा मेरे ज़ेहन में ताज़ा भी रहा और हर बार मेरा दम घोंटता रहा.

दशकों बीत गए हैं पर आज भी जब लोग धर्म-जाति के नाम पर दीवार खींचते हैं, ऐसा लगता कि चचा की रूह आसमान से कहीं मुझे ताक रही है.

शहरों में चल रही 'सहिष्णुता और असहिष्णुता' की कौआ पंचायत को शहर में ही छोड़कर अपने गाँव जा रहा हूँ. वश भर यही प्रयास करता हूँ कि साल भर टुकड़े कमाने से इतर ज़रा सा वक़्त अपनी ज़मीन पर भी बिताया जाए, कुछ धागों को मज़बूती के लिए सिर्फ़ रिश्तों की गरमी चाहिए होती है, और कुछ नहीं. ज़िंदगी सच में ही चार दिन की है और दो गुज़र चुके हैं ... बाक़ी के दो भी मुहब्बत से गुज़रें तो बेहतर होगा...

Go Back

Comment