Brajesh Singh

Poetry

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Lest we forget them...

गणतंत्र दिवस की शुभ कामनायें ।।

ये पर्व निर्विवादित रूप से मेरे बचपन के सबसे मनपसंद त्योहारों में से एक रहा है। महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जातीं थीं, शायद ही कोई समारोह मुझसे छूटा होगा। संघ संचालित स्कूल था और देशभक्ति से भरे साहित्य की कमी ना थी। शिक्षक ऐसे थे कि आज दिया लेकर निकलो तो भी ना मिलें, वो हम सब में सुभाष, भगत, आजाद ही देखते थे और हम उनमें भगवान।

नये कपड़े मिलते थे और इस बात की स्पर्धा थी कि स्कूल सेनापति (now school captain) होने के नाते मेरी कमीज सबसे ज्यादा सफेद दिखे। वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या यदि मैं भारत का प्रधानमंत्री होता पर भाषण; इनाम से ज्यादा ध्यान तालियों पर रहता था और जब आगे की कुर्सियों पर बैठे मेरे पिता जी और दीदी गर्व से मुस्कुराते तो अपने आपको सच में प्रधानमंत्री से कम न समझता।

छोटे से स्कूलों में बहूत साधारण तनख्वाह पाने वाले वो असाधारण शिक्षक अब नहीं मिलते; अब स्कूल 5 स्टार हो गये हैं, सुना है कि नयी किताबों में आजाद भारत के घोटालेबाज नेताओं ने भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद की जगह ले ली है।

जन साधारण भी गणतंत्र की महत्ता समझे, क्रांतिकारियों के बलिदान को याद रखे इसीलिए इसे पर्व का रूप दिया गया। दु:खद तो ये है कि उत्साह मनाना तो दूर...बूंदी और लहिया बंटना भी अब सरकारी स्कूलों तक सिमट गया है। कान्वेंट स्कूलों ने तो आजादी के त्योहारों को छुट्टी बनाकर छोड़ दिया है. लाखों रुपये फीस बसूलने वाले स्कूलों के मालिक ज्यादातर राजनेता ही हैँ और किसी सरकारी आयोजन में झण्डारोहण करते पाये जाते हैँ।

मुझे नहीं पता कि आने वाली पीढी ये जान भी पायेगी कि जिस स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवसों में उनके स्कूल छुट्टी मनाते हैं उसकी कीमत कई लोगों के बलिदान से चुकाई गयी है।

"जिस आजादी को भगत सिंह, पाने फांसी के पड़े फन्द
वो आजादी बतलाओ किस बंगले में कर दी गयी बंद ?"

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