Brajesh Singh

Poetry

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बारिश

 

आज बारिश में नहाया जी भर
'मैं' को खोया, तभी ख़ुद को पाया जी भर
 
गुज़ारा वक़्त ख़ुद के साथ एक अरसे के बाद
यादों के परिंदों को बुलाया जी भर

बेवजह मुस्कुराया, चला कुछ तक पैदल, 
लगायी शर्त सूरज से, लड़ा भी जी भर
 
तुम्हारे रंग लेकर फिर पहन डाले हैं जब से
साँस जो रुक सी गयी थी, फिर चली जी भर

 

 

 

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