Brajesh Singh

Poetry

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मैं फिर वो ज़िंदगानी चाहता हूँ...

 

मैं फिर वो ज़िंदगानी चाहता हूँ,
लड़कपन की कहानी चाहता हूँ, 
अकेलेपन की इन पगडंडियों पर,
घनी बारिश का पानी चाहता हूँ !!

 

किताबें लेने- देने या की अखबारों की कतरन को समेटे,
तुम्हारे पास आने का बहाना चाहता हूँ,
अधूरी रह गयी थी उस बरस, जब तुम गए थे,
ग़ज़ल वो ही सुनाना चाहता हूँ !!

 

लिखे तो थे, मगर न दे सका, मैं उन खतों को,
तुम्हें इस बार देना चाहता हूँ
जो तुम लाते थे अपने साथ मैं उस चाँद को अब,
उलाहने लाख देना चाहता हूँ !!

 

तुम्हारे हाथ से सेकी हुईं उन रोटियों की,
मैं फिर दावत उड़ाना चाहता हूँ
कभी आओ, मिलो, बैठो, कहो कुछ ...
बहुत मन में भरी बातें बताना चाहता हूँ !!

 

ये शोहरत, ये बुलंदी और नकलीपन के जामे,
मैं इनसे दूर जाना चाहता हूँ 

अभी तक तूने जो चाहा… किया, ये ज़िन्दगी अब,
मैं अपनी ज़िद पे आना चाहता हूँ !!

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