Brajesh Singh

Poetry

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रहगुज़र

 

किसी आशियाँ की तलाश में जो चले थे मेरे साथ वो

ना क़दम रहे, ना वो कारवाँ, सब रहगुज़र भी चले गये

कुछ लोग जो थे हमसफ़र, उन्हें मिल गया कोई और सा
वो चले गये यूँ छोड़कर, कोई राह जैसे भुला गये
 
जिन्हें हमने अपना खुदा कहा, जिन्हें पूजा हमने हर क़दम

वही आके मेरी लाश पर से, पड़ा कफ़न भी उड़ा गये

इस भरे शहर में रहा हूँ फिर, मैं कैसा बदहवास सा
वो अपना चेहरा छुपाके ज्यों, मुझे मेरा हश्र बता गये
 
मेरे दिल को अब भी यक़ीं नहीं, क्यों रूह में हैं शिकन कई
कुछ चेहरे कितने हसीन थे पर सीरतों से डरा गये

 
अब किससे क्या-क्या बयां करूँ, इस ज़िंदगी की किताब के
कुछ पन्ने थे जो मुड़े हुये, फिर खुल के सामने आ गये

 

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